Wednesday, July 13, 2011

रूठ जाती है...


ये प्रेम की डोरी बड़ी नाज़ुक है,
संभालना,,, थोड़े में टूट जाती है,
मुझे मालूम है क्यूंकि, वो कोई... जो मेरी है,
मुझसे हर बात पर रूठ जाती है,...

मन उसका चंचल इतना, कई दफा समझ नहीं पता,
क्यूँ रहती है वो बस मुझी से खफा, समझ नहीं पता,
जब किसी हसीं चेहरे का गुस्सा फूटता है तो,
तो दिल की सारी नशें टूट जाती है,
मुझे मलूँ है क्यूंकि, वो कोई... जो मेरी है,
मुझसे हर बात पर रूठ जाती है,...

जब जब वो मेरे मन से खफा रहती है,
तब तब खुशियाँ मेरे दामन से दफा रहती हैं,
कैसे करूंगा सामना उसका मिलने पर,
इसी सोच में मेरी कॉलेज की बस छूट जाती है,
ऐसा अक्सर होता है क्यूंकि, वो कोई... जो मेरी है,
मुझसे हर बात पर रूठ जाती है,...

रूठना और मनाना तो प्रेम के अमर फ़साने हैं,
ये तो किसी को रिझाने के सोचे समझे बहाने हैं,
पर जब इस बहानेबाजी में कुछ बातें दिल को छू जाती हैं
तो आँखों से आंसुओं की धार फूट जाती है,
मुझे मलूँ है क्यूंकि, वो कोई... जो मेरी है,
मुझसे हर बात पर रूठ जाती है,...

                                                          :- राहुल यादव 



2 comments:

  1. "कैसे करूंगा सामना उसका मिलने पर,
    इसी सोच में मेरी कॉलेज की बस छूट जाती है"
    ...

    रूठना और मनाना तो प्रेम के अमर फ़साने हैं,
    ये तो किसी को रिझाने के सोचे समझे बहाने हैं,
    पर जब इस बहानेबाजी में कुछ बातें दिल को छू जाती हैं"

    बहुत खूब और बहुत बहुत सुंदर - बधाई

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  2. First time i steeped in here....nice post

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